Home National यकीनन हर समाधान बंदूक की नली से नहीं निकलता…

यकीनन हर समाधान बंदूक की नली से नहीं निकलता…

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बस्तर की आदिवासी ज़िंदगी ने हमेशा से शहरों में इंटरनेट पर क्रांति लाने वाले लोगों को अपनी ओर खीचा है. मगर जमीनी स्तर पर वहां जिस तरह से बदलाव लाने की कोशिश होती है उसकी चर्चा बहुत कम होती है. धर्मपाल सैनी ऐसे ही एक बुजुर्ग हैं जो कभी बस्तर के खेत-जंगल और पहाड़ों के बीच एक ख़बर देखकर जा पहुंचे थे. वहां पहुंचने के बाद वहीं के होकर रह गए. इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी ने जनादेश नामक प्रतिष्ठित न्यूज वेबसाइट पर एक रिपोर्ट लिखी है. उसी रिपोर्ट को साभार यहां पेश किया जा रहा है. इस ख़बर में कुछ जरूरी संपादन किया गया है…

जवान की रिहाई के समय का वीडियो.

केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) का जवान माओवादियों की चंगुल से गुरुवार की शाम को रिहा कर दिया गया. सभी इसकी वाहवाही लेने में जुटे हैं. मगर बस्तर के एक गांधी यानी 90 से ज्यादा बसंत देख चुके बस्तर के ताऊजी धर्मपाल सैनी ही इस सफल रिहाई के मुख्य कर्ताधर्ता हैं.

जवान को छुड़ाने वाले ये बस्तर के गांधी हैं…

बीजापुर में रिहा किये गए जवान को सकुशल वापिस लाने के पीछे जो शख्स हैं, वह हैं 92 साल के ‘युवा’ और बस्तर के ताऊजी कहे जाने वाले धर्मपाल सैनी. उन्हें बस्तर का गांधी भी कहा जाता है. वे कोई 45 साल पहले अपनी युवावस्था में बस्तर की लड़कियों से जुड़ी एक खबर पढ़कर इतने विचलित हुए थे कि यहां आए और यहीं के हो गए.
अपने गुरु विनोबा भावे से डोनेशन के रूप में 5 रुपये लेकर वे वर्ष 1976 में बस्तर पहुंचे थे. वह पिछले 40 सालों से बस्तर में हैं. पद्मश्री सम्मानित सैनी अब तक देश के लिए 2000 से ज्यादा एथलीट्स तैयार कर चुके हैं. मूलतः मध्यप्रदेश के धार जिले के रहने वाले धर्मपाल सैनी विनोबा भावे के शिष्य रहे हैं.

इस ख़बर ने पहुंचाया बस्तर…

60 के दशक में सैनी ने एक अखबार में बस्तर की लड़कियों से जुड़ी एक ख़बर पढ़ी थी. ख़बर के अनुसार दशहरा के आयोजन से लौटते वक्त कुछ लड़कियों के साथ कुछ लड़के छेड़छाड़ कर रहे थे. लड़कियों ने उन लड़कों के हाथ-पैर काट कर उनकी हत्या कर दी थी. यह समाचार पढ़कर वे सोच में पड़ गए. उन्होंने बस्तर की लड़कियों की हिम्मत और ताक़त को सकारात्मक बनाने की ठानी.

विनोबाजी से लिया 5₹ का नोट और चल पड़े बस्तर

कुछ सालों बाद उन्होंने अपने गुरु विनोबा भावे से बस्तर आने की अनुमति मांगी लेकिन शुरू में उन्हें इजाज़त नहीं मिली. कई बार निवेदन करने के बाद विनोबाजी ने उन्हें 5 रुपये का एक नोट थमा दिया. साथ ही, इस शर्त के साथ अनुमति दी कि वे कम से कम दस साल तक बस्तर में ही रहेंगे.

उपलब्धता के नाम पर हैं हजारों मेडल और ट्रॉफी

आगरा यूनिवर्सिटी से कॉमर्स ग्रेजुएट सैनी खुद भी एथलीट रहे हैं. वे बताते हैं कि जब वे बस्तर आए तो देखा कि छोटे-छोटे बच्चे भी 15 से 20 किलोमीटर आसानी से चल लेते हैं. उन्होंने बच्चों की इस क्षमता को खेल और शिक्षा में इस्तेमाल करने की योजना बनाई. उनके डिमरापाल स्थित आश्रम में हजारों की संख्या में मेडल्स और ट्रॉफियां रखी हुई हैं. आश्रम की छात्राएं अब तक स्पोर्ट्स में ईनाम के रूप में 30 लाख से ज्यादा की राशि जीत चुकी हैं.

साक्षरता का ग्राफ 50 प्रतिशत तक पहुंचा

धर्मपाल को बालिका शिक्षा में बेहतर योगदान के लिए वर्ष 1992 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया. साल 2012 में ‘द वीक’ मैगजीन ने सैनी को ‘मैन ऑफ द ईयर’ चुना था. उनके के  बस्तर में आने के बाद साक्षरता का ग्राफ 10 प्रतिशत से बढ़कर 50 प्रतिशत के करीब पहुंच चुका है. उनके विद्यालय की बच्चियां एथलीट, डॉक्टर और प्रशासनिक सेवाओं में जा चुकी हैं. आज वे 92 साल के हैं और राकेश्वर सिंह को सकुशल लाने का अनुरोध मुख्यमंत्री भूपेश्वर बघेल ने किया था.

तस्वीर में दिख रही महिला कौन हैं?

सुगबुगाहट तो यह भी है कि वे कई महीने से नक्सलियों से शांति वार्ता के लिए प्रयास कर रहे थे. वार्ता के शुरू होने से पहले केंद्रीय बलों ने यह दबिश दी और वार्ता को पटरी से नीचे उतार दिया. तस्वीर में जो महिला दिख रह हैं, वह हैं बस्तर के इन गांधी की सहयोगी मुरुतुण्डा की सरपंच सुखमती हक्का. यह बस्तर में औरत की मजबूती को बयां करती तस्वीर है.

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