Home Opinion हिंदी हैं हम वतन है हिंदोस्तां हमारा…

हिंदी हैं हम वतन है हिंदोस्तां हमारा…

0

महान लेखक. ग़रीबों के पैरोकार. दबे-कुचले जीवन की आवाज़ कहे जाने वाले हिंदी के अनमोल हस्ताक्षर प्रेमचंद जी का यही दुर्भाग्य था कि उन्होंने हिंदी में लेखन को चुना. वहीं, हिंदी का यह सौभाग्य है कि उसे प्रेमचंद सरीखे न जाने कितने साहित्य सूर्य मिले. जिनकी, रोशनी से हिंदी जगमगा रही है. लुभा रही है. आज भी सबको रिझा रही है. मगर हिंदी के वर्तमान प्रसिद्ध लेखकों को छोड़ दें तो अन्य को आखिर ऐसा कौन सा ‘श्राप’ मिला है कि वे अपने जीवन में न तो धन कमा पाते हैं और न ही यश. हालांकि, उनके मरणोपरांत वे अचानक ही यशकीर्ति के रूप में देखे जाने लगते हैं.

सांकेतिक तस्वीर. Courtesy : Google Image

दुनिया में अनगिनत बोलियां बोली जाती हैं. एक अनुमान के अनुसार दुनिया में कुल भाषाओं की संख्या करीब 6809 है. इनमें से 90 फीसदी भाषाओं को बोलने वालों की संख्या एक लाख से भी कम है. लगभग 200 से 150 भाषाएं ऐसी हैं, जिनको 10 लाख से अधिक लोग बोलते हैं. इंटरनेट पर थोड़ा सा ‘गुगलाने’ पर पता चलता है कि हिंदी भाषा से प्रेम करने वालों की संख्या भारत की जनगणना 2011 के मुताबिक, 57.1 प्रतिशत है. इनमें से 43.63 फीसदी भारतीय लोगों ने हिंदी को ही अपनी मातृभाषा घोषित की थी. वहीं, भारत, पाकिस्तान और अन्य देशों में 14 करोड़ 10 लाख लोगों द्वारा बोली जाने वाली उर्दू, व्याकरण के आधार पर हिंदी के समांतर ही है. यही नहीं भारत में हिंदी विभिन्न भारतीय राज्यों की 14 आधिकारिक भाषाओं और क्षेत्र की बोलियों का उपयोग करने वाले लगभग एक अरब लोगों में से अधिकांश की दूसरी भाषा है. यानी हिंदी का पाठक वर्ग बहुत बड़ा है. फिर भी हिंदी के लेखकों को अब भी उतनी तरज़ीह नहीं मिलती है जितनी मिलनी चाहिये. यह चिंता का सबब है.

OTT ने नवीन हिंदी लेखकों को दिया रोजगार

हालांकि, कोरोना महामारी ने एक ओर जहां व्यवसाय और दूसरी जीवीकोपार्जन के रास्ते बंद किये हैं. वहीं, दूसरी ओर मनोरंजन जगत में ओटीटी के माध्यम से नवीन हिंदी लेखकों को जीवीका चलाने का रास्ता भी दिखाया है. इसके उलट अंग्रेजी आज भी निपुण व कुलिष्ठजनों की भाषा के तौर पर देखी जाती है. हम हिंदीभाषी लोगों के लिये यह विचारयोग्य तथ्य है कि आखिर हिंदी को अब भी तरक्की के मार्ग में दोयम दर्जे की भाषा का स्थान क्योंकर प्राप्त है?

कुछ युवा लेखक इन धारणाओं को तोड़ते दिखते हैं . . .

इस मरीचिका में कुछ युवा लेखक इन धारणाओं को तोड़ते दिखते हैं. उनमें सत्य व्यास, दिव्य प्रकाश दुबे एवं निलोत्पल मृणाल जैसे हिंदी लेखक शामिल हैं. इन्होंने अपने जीवन में ही यश और धन-वैभव कमाकर हिंदी को तरक्की पाने वालों की भाषा में शुमार करने का कारनामा अंज़ाम दिया है. वह इसलिये क्योंकि प्रकाशकों और पाठकों ने इन पर भरोसा जताया है. यानी युवा लेखकों को अवसर मिलने से ऐसे और भी तारे खुदको सूर्य की तरह रोशन कर सकेंगे. हिंदी सर्वप्रिय और सर्वसुलभ बनाने में यूनिकोड फॉन्ट की खोज करने वाले का भी विशेष योगदान है. इन छोटे-छोटे परिवर्तन ने हिंदी के मार्ग को आसान किया है. इसे सर्वग्राही बनाया है. लोकप्रिय बनाने में अहम योगदान निभाया है. यदि ऐसे ही भविष्य में भी हिंदी के प्रति प्रेम और समर्पण दिखाया जाये तो वह दिन दूर नहीं जब हम गर्व से कह सकेंगे कि हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्तां हमारा…

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here