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बिहार : अमरेश ने उपजाई एक लाख रुपये प्रति केजी वाली सब्जी, अब लोगों के लिये बन गए हैं नज़ीर

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अमरेश सिंह अपने खेत में (साभार : सोशल मीडिया)

बिहार के औरंगाबाद में एक कृषि क्रांति इन दिनों चर्चा का विषय है. यहां एक लाख रुपये प्रति किलोग्राम मिलने वाली “Hop-Shoots” की सब्जी उपजाने का कारनामा अंजाम दिया गया है. 38 वर्षीय अमरेश सिंह की कोशिश ने सभी को अचंभे में डाल दिया है.

साल 2012 में हजारीबाग के सेंट कोलम्बस कॉलेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद अमरेश ने सबसे महंगी सब्ज़ी में शुमार इस खेती को करने का फैसला लिया है. उन्होंने इसके लिए अपने औरंगाबाद जिले के नवीनगर ब्लॉक के करमदीह ग्राम के खेत में काम करने का निर्णय लिया. इसके लिए उन्होंने पांच कट्ठा खेत में रोपाई की है.

अनुमान है कि 1000 पाउंड प्रति केजी यानी करीब एक लाख रुपये प्रति केजी के भाव में इसकी बिक्री की जाएगी. यह भाव छः साल पुराना है. भारतीय बाज़ार में यह सब्जी अमूमन नहीं देखी जाती है. विशेष रूप से मंगाने पर ही इसे बेचा-खरीदा जाता है.

आम किसान की बढ़ सकती है 10 गुना कमाई

सिंह ने एक प्रसिद्ध अंग्रेजी अखबार से कहा, “इस खेती का 60 फीसदी काम सम्पन्न हो चुका है. मैं इस बार काफी उत्साहित हूं.” वे आगे कहते हैं, “यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हॉप-शूट्स की खेती को बढ़ावा देने के लिए कोई पहल करेंगे तो यह एक सराहनीय कदम होगा. इस खेती की मदद से एक आम किसान अपनी कमाई करीब दस गुना तक बढ़ा दिया है.”

पड़ताल में इस ख़बर का निकल गया दम.

बता दें कि वाराणसी स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. लाल की देखरेख में इस सब्ज़ी की रोपाई आदि का काम किया गया है. सिंह ने कहा, “मैंने इस उपज को करीब दो माह पहले ही रोपा था. इसका बीज आदि वाराणसी के संस्थान से मुहैया कराया गया था. मुझे उम्मीद है कि बिहार के कृषि जगत में इसका दूरगामी लाभ होगा.”

Hop-shoots

इसकी विशेषता के बारे में उन्होंने कहा, “बेवरेज बनाने में इसके फल, फूल और पत्तियों का उपयोग किया जाता है. बियर और दवा बनाने में भी इसका उपयोग किया जाता है. एन्टीबॉडीक निर्माण में इसकी अहम उपयोगिता रहती है. टीबी के उपचार के लिए बनाई जाने वाली दवाओं में इसकी मांग ज्यादा रहती है.” इस युवा कृषक ने कहा, “इसके फूल को हॉप-शंकु या स्ट्रोबाइल कहा जाता है, जिसका उपयोग बीयर बनाने में स्थिरता एजेंट के रूप में किया जाता है. बाकी टहनियों का उपयोग भोजन और दवा के प्रयोजनों के लिए किया जाता है.”

हॉप-शूट की खोज 11वीं शताब्दी की शुरुआत में की गई थी…

जड़ी-बूटी के रूप में हॉप-शूट का उपयोग यूरोपीय देशों में भी लोकप्रिय है, जहां इसका उपयोग त्वचा को चमकदार और युवा रखने के लिए किया जाता है क्योंकि सब्जी भी एंटीऑक्सिडेंट का एक समृद्ध स्रोत है. हॉप-शूट की खोज 11वीं शताब्दी की शुरुआत में की गई थी. शुरुआत में बीयर में स्वाद बढ़ाने वाले एजेंट के रूप में इस्तेमाल किया गया था और फिर हर्बल दवा और धीरे-धीरे सब्जी के रूप में इसका उपयोग किया गया था.

बता दें कि इसमें ह्यूमलोन और ल्यूपुलोन नामक एक एसिड होता है जो मानव शरीर में कैंसर कोशिकाओं को मारने में प्रभावी माना जाता है. दवा पाचन तंत्र में सुधार करती है. अवसाद एवं चिंता वाले लोगों के लिए आराम प्रदान करती है. यह एक एनाल्जेसिक है और अनिद्रा को भी ठीक करती है.

पहले हिमाचल प्रदेश में होती थी खेती

सिंह ने कहा कि हॉप-शूट की खेती यूरोपीय देशों जैसे ब्रिटेन, जर्मनी और अन्य में की जाती है. भारत में यह पहले हिमाचल प्रदेश में बोयी जाती थी. मगर उच्च कीमत के कारण इसकी मार्केटिंग आसान नहीं थी. हालांकि, इसकी मांग हमेशा रहती है. अमरेश के मुताबिक, इसके अलावा वह कई अन्य औषधीय और सुगंधित पौधों की खेती भी करता है. वे कहते हैं, “मैंने बिहार में हॉप-शूट की खेती के साथ प्रयोग करने के लिए जोखिम उठाया है. उम्मीद है कि यह एक उदाहरण बनेगा.”

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