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एक देश, दो तस्वीर : मस्जिद के नाम पर नफरत फैलाने के लिए बेकरार ‘छुटभैये नेता’

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राजनीति करने वालों को लॉकडाउन तोड़ने पर चंद लोग हीरो मानेंगे मगर आम आदमी तो अपनइ गलती स्वीकार कर ही लेता है.

हिंदुस्तान की दो तस्वीरें जो बयां करती हैं देश की मुख्य समस्या, धर्म की आड़ में राजनीति की रोटी सेंकते चंद मुस्लिम नेता…

लॉकडाउन के चलते देश में  कहीं भी आने-जाने की पाबंदी लगा दी गई है. ऐसे में धार्मिक स्थल भी इससे अछूते नहीं हैं. मगर समय-समय पर इसे लेकर विवाद भी देखा जा रहा है. मुस्लिम बहुल इलाकों में रमजान के चलते मस्जिद को जबरन खोलने का दबाव बनाया जा रहा है.

इन दिनों रमजान का पाक महीना चल रहा है. रोजेदार नमाज अता कर रहे हैं. बड़ी संख्या में लोग घरों में नमाज पढ़ रहे हैं मगर खुराफाती मस्जिद के दरवाजों पर उमड़ रहे हैं. पुलिस को करजोरी से लेकर बलप्रयोग तक करना पड़ रहा है. फिर भी चंद नाशुकराने लोग देश में माहौल को खराब करने पर आमादा हैं. वे रमजान के पाक दिनों को भी नफरत की हवा से गर्म कर नापाक करने की जुगत कर रहे हैं. हालिया वीडियो हैदराबाद से आ रहे हैं. हालांकि, इन वीडियोज को किसी धार्मिक संदेश नहीं बल्कि राजनीति की रोटी सेंकने वालों की निकृष्ट सोच को उजागर करने की नज़र से देखने की जरूरत है.

इन वीडियोज में साफ देखा जा सकता है कि किस तरह पुलिस को मस्जिद की दहलीज पर आने से रोकने के लिए धमकाया जा रहा है. स्थानीय छुटभैये नेता अपनी धमक दिखाने के लिए भीड़ एकत्र करके खाकी को परेशान कर रहे हैं. मगर हुक्मरान इस पर सख्त कदम उठाने से परहेज कर रहे हैं. वे पुलिस के आलाधिकारियों से भी ऐसे पेश आ रहे हैं जैसे वे किसी को घुड़की दे रहे हों. माहौल खराब न हो जाए इसके लिए पुलिसकर्मी भी बात को टालते नजर आ रहे हैं.

खास बात यह है कि रमजान के दौरान कोरोना महामारी के चलते मक्का और मदीना तक के दरवाजे बंद कर दिए गए हैं. वहां सिर्फ मस्जिद की कमेटी से जुड़े यानी कर्मचारी ही नमाज पढ़ने आ रहे हैं. मगर भारत देश के वे मुस्लिम जो माहौल में सिर्फ गंध फैलाने की ताक में रहते हैं, इसके लिए तैयार नहीं हैं. देश और देशवासियों को नफरत की ऐसी बयार बहाने वालों से संभलकर रहने की जरूरत है.

यह तो पहले से ही तय है कि COVID19 किसी मजहब विशेष को खतरा नहीं पहुंचाता है बल्कि वह इंसानी नस्ल के लिए अब तक का सबसे बड़ा कहर साबित हो रहा है. ऐसे में हैदराबाद, पश्चिम बंगाल और देश के दूसरे हिस्सों से आने वाली इन तस्वीरों और वीडियो को देखकर मन में कई सवाल जाग जाते हैं. खासकर, तब जब चंद रोज पहले ही कानपुर का एक वीडियो भी देखा गया था जिसमें एक बुजुर्ग मंदिर जाते समय पुलिस अफसर के हाथों जलील हुए थे. मगर यहां वे गलत थे और उन्होंने बिना किसी विरोध के अपनी गलती को स्वीकार करते हुए वहां से घर लौट जाना उचित समझा था. फिर मस्जिद को जबरन अपनी राजनीति का अखाड़ा बनाने वालों को पुलिस कैसे रोके.

उत्तर प्रदेश की राजधानी में बंद हैं मस्जिद के दरवाजे. लोग शांति से घरों में पढ़ रहे हैं नमाज.

देश में दिख रहीं इन तस्वीरों को हमें किसी सम्प्रदाय विशेष के चश्मे से नहीं बल्कि लॉकडाउन के अनुपालन का मजाक उड़ाने की तर्ज पर देखना चाहिए. साथ ही, नफरत की राजनीति करने वालों से देश की जनता को स्वयं ही दूरी बना लेनी चाहिए. मगर अच्छी बातों को पढ़ना और सुनना एक बात है और उसे जीने के लिए जीवन में अपनाना दूसरी बात है. यकीनन, राजनीति करने वालों को लॉकडाउन तोड़ने पर चंद लोग हीरो मानेंगे मगर आम आदमी तो अपनी गलती स्वीकार कर ही लेता है. चाहेे वह जिस मजहब का हो.

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