सच है कि वंशवाद (nepotism) ने हमेशा से ही प्रतिभा (talent) को मसलकर टूटने पर मजबूर किया है…

बॉलीवुड में वंशवाद बनाम प्रतिभा का शोर गूंज उठा है. अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने सवालों की झड़ी लगा दी है. यह भी सच है कि वंशवाद (nepotism) ने हमेशा ही प्रतिभा (talent) को मसलकर टूटने पर मजबूर किया है. ऐसे में फिल्मजगत के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक अजय ब्रह्मात्मज ने अपने ट्वीटर हैंडल से एक ट्वीट कर बॉलीवुड में वंशवाद के बीज की एक घटना का जिक्र किया है. उन्होंने ट्वीट में मशहूर फिल्मकार केदार शर्मा की बायोग्राफी, “The One And Lonely Kidar Sharma” में बयां की गई एक घटना का जिक्र किया है…

मैंने कहीं पढ़ा था कि मेरे आवास के करीब ही दो निष्ठावान पंजाबी केएल सहगल और पृथ्वीराज कपूर रहते हैं. वे न्यू थियेटर में काम करते थे. वहीं पर मेरे आदर्श श्री डीके बोस “राजा, रानी, मीरा” का निर्माण कर रहे थे. वे दोनों ही अभिनेता थे लेकिन अभी सितारे नहीं बने थे. रविवार की एक सुबह मैं कपड़े पहनकर तैयार हुआ.एक बार फिर बांका छैला दिख रहा था. मैंने पृथ्वीराज कपूर का दरवाजा खटखटाया. एक छः-सात साल के गोलमटोल बच्चे ने दरवाजा खोला. वह बड़ी-बड़ी नीली आंखों में एक फ़रिश्ते सा नजर आ रहा था. उसका रंग गोरा था. उसके बाल सुनहरे थे. मगर उसकी मुस्कान नटखट थी. वह थे पृथ्वीराज कपूर के सबसे बड़े बेटे रणबीर राज कपूर. आगे चलकर वह भारतीय सिनेमा जगत में खूब ख्याति बटोरी.

वह छोटा बच्चा मुझे आंगन जैसे नजर आने वाले रसोईघर के रास्ते बेडरूम में ले गया जहां पृथ्वीराज कपूर सितार बजा रहे थे. एक पहलवान की तरह दिखने वाले पृथ्वीराज उस समय उस वाद्ययंत्र के साथ कुश्ती करते हुए प्रतीत हो रहे थे. शिक्षा और संगीत की देवी सरस्वती के उस वाद्ययंत्र में कम्पन्न से करुणा की आवाज आ रही थी.

वह अपने रोजाना के रियाज में मशगूल थे. उन्होंने मुझे देखते ही हाथों से इशारा करके अपने करीब आकर बैठने को कहा. वे इतने उमंग में थे कि उनकी आधी आंखें बंद थीं. वे वाद्ययंत्र को सजा देना जारी रखते हैं. उनकी मजबूत अंगुलियां तार को कसकर जकड़े हुई थीं. उसके बाद उन्होंने धीमी और गुंजायमान आवाज में कहा, “यह राग भैरवी है-सदा सुहागन, और लय मैं आपको जनता हूं और आप यहां क्या लेने आये हैं?” उनका अंदाज शेक्सपियर के समान था.
मैंने तो पूरा अभ्यास किया था कि जब मेरी मुलाक़ात होगी तो मैं क्या कहूंगा और मैंने कहना शुरू किया, श्रीमान कपूर, मैं एक कवि हूं, एक नाटककार हूं, एक संगीतकार हूं और एक अभिनेता भी हूं. मैं स्वर्ण मंदिर की भूमि अमृतसर से आया हूं. मेरा जल्द ही अंग्रेजी विषय में स्नातकोत्तर पूरा हुआ है और मैं श्री डीके बोस जी से मिलने की हर राह पर चल चुका हूं. इसलिए कृपया आप पंजाबी भाई होने के नाते क्या मुझे उनसे मिलवा सकते हैं?”

पृथ्वीराज सीतार के तारों को छेड़ना बंद करके मीठी आवाज में कहते हैं, “मेरी ईच्छा है कि मैं आपकी मदद करूं…लेकि नियति मेरा गुरु है और वही मेरे सभी कामों को अपने हिसाब से तय करती है. मैं एक असहाय कठपुतली हूं. मैं अपने छोटे भाई त्रिलोक की सिफारिश पहले ही कर चुका हूं. श्री बोस के सामने अभी मैं किसी दूसरे नाम की सिफारिश नहीं कर सकता. पानी से कहीं ज्यादा गाढ़ा खून होता है. इसीलिए मैं आपसे माफी मांगता हूं कि मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता. मगर मैं आपको एक सलाह देता हूं कि मेरे घर के अगले दरवाजे को खटखटाइये. वहां केएल शगल थे. सम्भावना है कि वह आपकी मदद कर दें.

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