कोविड-19 ने गुरुवार को देश के विख्यात कवि और गीतकार डॉ. कुंवर बेचैन की ज़िंदगी ले ली…

कोविड-19 ने गुरुवार को देश के विख्यात कवि और गीतकार डॉ. कुंवर बेचैन की ज़िंदगी ले ली. कुंवर बेचैन का नोएडा के कैलाश अस्पताल में इलाज चल रहा था.

79 वर्षीय डॉ. कुंअर बेचैन का वास्तविक नाम डॉ. कुंवर बहादुर सक्सेना था. उनका जन्म 1 जुलाई 1942 को उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद के उमरी गांव में हुआ था. उनका बचपन चंदौसी में बीता. अगर उनकी श‍िक्षा की बात करें तो उन्‍होंने एमकॉम के साथ एमए (हिंदी) व पीएचडी की पढ़ाई की है. वो गाजियाबाद के एमएमएच महाविद्यालय में हिंदी विभागाध्यक्ष के रूप में अध्यापन कार्य कर चुके हैं. वे यहां रीडर भी रहे. 

कुंवर बेचैन के निधन की खबर कवि कुमार विश्वास ने ट्वीट कर दी. पिछले दिनों कोरोना संक्रमित होने के बाद डॉ. कुंवर बेचैन का नोएडा के कैलाश हॉस्पीटल में इलाज चल रहा था. शुरुआत में उन्हें बेड ना मिल पाने के कारण काफी दिक्कतें हुई थी. कई लोगों के प्रयास के बाद वे कैलाश हॉस्पिटल में भर्ती कराए गए थे.

बता दें कि डॉ. कुंवर बेचैन और उनकी पत्नी संतोष कुंवर कोरोना संक्रमित थीं. पॉजिटिव पाए जाने के बाद से ही दोनों दिल्ली के लक्ष्मीनगर स्थित सूर्या अस्पताल में एडमिट थे. हालत में सुधार नहीं होने पर डॉ. कुंवर बेचैन को आनंद विहार स्थित कोसमोस अस्पताल में शिफ्ट किया गया. कोसमोस अस्पताल में एडमिट किए जाने के बाद भी उनकी स्थिति में सुधार नहीं हो रहा था. इसके बाद कुमार विश्वास के प्रयासों के चलते गौतमबुद्ध नगर के सांसद महेश शर्मा की मदद से उन्हें कैलाश अस्पताल में वेंटिलेटर मिल पाया था.

कुछ प्रमुख रचनाएं…

गीत-संग्रह: पिन बहुत सारे (1972), भीतर साँकलः बाहर साँकल (1978), उर्वशी हो तुम (1987), झुलसो मत मोरपंख (1990), एक दीप चौमुखी (1997), नदी पसीने की (2005), ग़ज़ल-संग्रह: शामियाने काँच के (1983), महावर इंतज़ारों का (1983), रस्सियाँ पानी की (1987), पत्थर की बाँसुरी (1990), दीवारों पर दस्तक (1991), नाव बनता हुआ काग़ज़ (1991), आग पर कंदील (1993), आँधियों में पेड़ (1997), आठ सुरों की बाँसुरी (1997), आँगन की अलगनी (1997), तो सुबह हो (2000); कविता-संग्रह: नदी तुम रुक क्यों गई (1997), शब्दः एक लालटेन (1997); पाँचाली (महाकाव्य)

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