बाराबंकी जनपद की तहसील रामनगर के तराई के गांव सिसौड़ा में लोग वैक्सीन लगवाने से इस कदर डर गए कि उन्‍होंने नदी में छलांग लगा दी थी. Courtesy : Social Media

बिहार के एक भद्र गांव में आंगनवाड़ी कार्यकर्त्रियों को वैक्सीनेशन का जिम्मा सौंपा गया. उन्हें करीब वैक्सीनेशन की 100 डोज देकर गांव में बूथ लगाने का आदेश मिला था…

यह घटना बिहार की है. मगर इससे देशभर के ग्रामीण इलाकों में व्याप्त समस्या को समझा जा सकता है. कोविड-19 ने हम सबको परेशान कर दिया है. व्यापारियों का गल्ला चटक रहा है और तन्ख्वाहियों में असुरक्षा की भावना ने घर कर लिया है. बच्चे साल 2020 से स्कूल जाने को तरस गये हैं. पढ़ाई से दूरी बनाने वालों की तो पौबारह हो चुकी है. उनकी मुराद बिन मांगे जो पूरी हो रही है. यानी बचपन भी स्याह कोपल में घिर चुकी है. ऐसे में देश को सुरक्षा की चादर में लपेटने के लिये वैक्सीन ही सबसे मुफ़ीद उपाय है. देश की केंद्र और राज्य सरकारों की अधूरी और अधकचरी योजना ही सही मगर वे वैक्सीनेशन के लिये हूंकार भर रहे हैं. लोगों को जागरूक किया जा रहा है. मोबाइल पर कॉलरट्यून के जरिये और टीवी-रेडियो पर विज्ञापन की बयार चलाकर सबको वैक्सीन सेंटर पर आमंत्रित किया जा रहा है. मगर कहते हैं न कि पेड़ कितना ही मजबूत हो उसमें दीमक ने दिलचस्पी दिखा दी तो समझिये की बेड़ा गर्क होना तय है. इस योजना को भी अफवाह नाम का एक दीमक अंदर ही अंदर चट रहा है.

दरअसल, बिहार के एक भद्र गांव में आंगवाड़ी कार्यकर्त्रियों को वैक्सीनेशन का जिम्मा सौंपा गया. उन्हें करीब वैक्सीनेशन की 100 डोज देकर गांव में बूथ लगाने का आदेश मिला था. ग्रामीणों को एक दिन पहले ही सूचना दे दी गई. कानों में वैक्सीन अवश्य कराने की सूचना भी मौखिक रूप से ‘चस्पा’ दी गई. मगर अफवाह उड़ाने वालों ने दीमक की तरह इस योजना को चटना शुरू कर दिया. वे कोरोना वायरस को हराने की जगह वैक्सीनेशन की इस पूरी प्रक्रिया को ही धता बताने पर आमादा हो गये. उन्होंने गांव में हर आंगन तक यह सूचना पहुंचा दी कि वैक्सीन लगवाओगे तो मर्दानगी से हाथ धो बैठोगे. शरीर को मजबूत रखना हो तो वैक्सीन सेंटर से कोसों दूर रहो. देखते ही करीब पांच हजार की आबादी वाले गांव में 100 वैक्सीन की खपत करना भी नामुमकिन सा हो गया. लोग कैंप को देखकर भाग गये. हर रोज खड़ंजे की टूटी ईंट भी गिन लेने वाले खलिहर उस दिन जरूरी काम से शहर की ओर रवाना हो गये. आंगनवाड़ी कार्यकर्त्रियों को तो कांठ सा मार गया. वैक्सीनेशन योजना की असफलता पर नहीं नौकरी के भय को लेकर. वर्ना उन्हें क्या जरूरत थी जो वे गांव वालों का मनौव्वल करतीं. यूं भी बुरी बात एक पल में कई कोस की दूरी तय कर जाती है और अच्छी बातों को स्वीकार करने में एक ही आंगन को पार करने में जन्म बीत जाता है. यहां भी यही हुआ. लोग लाख समझाने के बाद भी वैक्सीन लगवाने को राजी नहीं हुये. काफी देर बाद करीब आठ लोग कोविशील्ड की शरण में आने को राजी हुये. सुबह से शाम तक लाख मिन्नतों के बाद भी मात्र आठ डोज की खपत हो सकी.

आंगनवाड़ी कार्यकर्त्रियों ने अपना बैग पैक किया. वह अगले दिन ऐसा ही एक और कैंप लगाने की योजना बना रही थीं. मुझे यकीन है कि यदि कोरोना कोई रोग न होकर इंसान होता तो रावण की दहाड़ मारकर हंस रहा होता. कौन जाने वायरस ही हंस रहा हो? हमें पता न चला हो. समस्या यह बिहार सरकार की ही नहीं सबकी है. यूपी में भी कुछ रोज पहले ही बाराबंकी जनपद की तहसील रामनगर के तराई के गांव सिसौड़ा में लोग वैक्सीन लगवाने से इस कदर डर गए कि उन्‍होंने नदी में छलांग लगा दी थी. यह नजारा देख स्वास्थ्य विभाग की टीम के हाथ-पांव फूल गए थे. वे ग्रामीणों से नदी से बाहर आने का अनुरोध करने लगे. काफी समझाने के बाद चंद लोग ही वैक्सीन लगवाने को राजी हुये. बाकी सबने खुद को ‘मार्वल कॉमिक्स सीरीज का एवेंजर’ घोषित कर लिया और फन्ने खां बनकर घर चले गये. यूं भी प्रवचनों से ज्यादा अफवाह कारगर साबित होती रही हैं. लोग वैक्सीन की सुरक्षा में स्वत: ही सेंध लगा रहे हैं. ऐसे सेंधबाजों में अपना नाम दर्ज कराने से अच्छा है कि इस न्यूज वेबसाइट के पाठकगण एक कदम आगे बढ़कर वैक्सीन लगवाएं. सेंटर पर खुद जाएं और दूजों को भी जगाएं. आइये, देश को कोरोना मुक्त करें.

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